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फतेहपुर सीकरी


फतेहपुर सीकरी जिसे आज हम एक ही नाम से जानते है फतेहपुर सीकरी लेकिन 1571 से पहले फतेहपुर नाम का कोई गांव या शहर नहीं था। जब अकबर के आँगन में सूफी संत बाबा शेख सलीम चिस्ती की दुआ से एक बच्चे ने जन्म लिया जो आगे चलकर जहाँगीर के नाम से जाना गया। तब अकबर ने सीकरी के पास में फतेहपुर का निर्माण किया। कैसे हुआ इसका निर्माण और कितना समय लगा इसको बनने में और बाद में कैसे ये खंडहर में बदल गया जानते है इसका पूरा इतिहास। तो चलिए शुरू करते है-


सीकरी पहले एक छोटा सा गांव हुआ करता था जो पहले शुंग शासन के अंतर्गत और बाद में कान्यकुब्ज ब्राह्मणों के अंतर्गत फलता फूलता रहा। जिनका 7वीं शताब्दी से 16वीं शताब्दी तक इस क्षेत्र पर नियंत्रण रहा। इसके बाद ये दिल्ली सल्तनत के अंतर्गत आ गया जिसके बाद यहां पर कई मस्जिदें बनाई गई।

सीकरी गांव में खुदाई के दौरान यहां जैन कालीन मूर्तियां, मंदिर और अन्य वस्तुएं मिली जिससे पता चलता है कि यह पहले अच्छी सभ्यता निवास करती थी। किन्तु सीकरी गांव को मुख्य पहचान अकबर के आने के बाद मिलीं।


अकबर और सीकरी

मुगलों के आने के बाद भारत का नक्शा बदल गया। भारत में नई संस्कृति का समावेश हुआ। सूफी संतों का प्रभाव बढ़ गया। उसी समय एक शेख सलीम चिश्ती जो एक सूफी संत थे सीकरी में आकर बस गए। इनको लोगो का सम्मान प्राप्त हुआ और ये उस समय के प्रसिद्ध संतों में गिने जाने लगे।

हुमायूं की मृत्यु के पश्चात जब बैरम खां ने 1556 में पंजाब के कलानौर में 13 वर्ष के अकबर का राज्याभिषेक किया। उसके बाद अकबर ने पानीवत के युद्ध में हेमू को हरा कर वापस आगरा का किला हासिल किया और आगरा की गद्दी पर विराजमान हुआ। उसके बाद अकबर ने कई युद्ध लड़े और अपने साम्राज्य का विस्तार किया। 

1562 में अकबर ने आमेर के राजा भारमल की बेटी से शादी की जिससे मुगल और राजपूत सम्बन्ध मजबूत हुए।शादी के 6-7 साल पश्चात भी जब अकबर को कोई पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई तब अकबर सीकरी के संत शेख सलीम चिश्ती के पास गए और उन्होंने अकबर को आशीर्वाद दिया कि तुझे जल्द ही एक पुत्र की प्राप्ति होगी। तब उनके आशीर्वाद से अकबर को 1569 में एक पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम शेख सलीम चिश्ती के नाम पर सलीम रखा गया जो आगे चलकर ज़हांगीर के नाम से राजा बना और गद्दी पर बैठा।


फतेहपुर सीकरी का निर्माण (1571 - 1585)

1569 में सलीम के जन्म के उपरांत अकबर ने शेख़ सलीम चिश्ती के प्रति श्रद्धा में फतेहपुर सीकरी को राजधानी के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया और 1571 मे सीकरी का निर्माण प्रारंभ हुआ। इस शहर को बनाने में लाल बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया। इसकी वास्तुकला में हिंदू, जैन और इस्लामी शैलियों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। जब फतेहपुर सीकरी बनकर तैयार हो रहा था, तब वह दुनिया के सबसे आधुनिक और सुंदर शहरों में से एक था। समकालीन इतिहासकारों और उस दौर में भारत आए यूरोपीय यात्रियों (जैसे राल्फ फिच) ने इसे 'लंदन से भी बड़ा और भव्य शहर' बताया था। इसे बनाने में लगभग 15 साल का समय लगा और 1585 ई. तक इसका प्रमुख निर्माण कार्य पूर्ण हुआ। फतेहपुर सीकरी अकबर के लिए एक "खुला कैनवास" था जहाँ उसने अपनी वास्तुकला की पसंद और अपनी नई सोच को आकार दिया। यहाँ की इमारतों में कहीं भी "कब्र" जैसी उदासी नहीं थी, बल्कि यह शहर जीवन और उत्सव से भरा हुआ था।

16वीं शताब्दी में गुजरात समुद्री व्यापार, बंदरगाहों और समृद्ध नगरों के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण प्रांत था। यहाँ का शासक मुज़फ़्फ़र शाह तृतीय कमजोर था और आंतरिक संघर्षों से जूझ रहा था। अकबर ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए 1572 ई. में गुजरात अभियान आरंभ किया। तीव्र कूच और कुशल सैन्य रणनीति के कारण सूरत, अहमदाबाद और पाटन जैसे प्रमुख नगर मुगलों के अधीन आ गए। 1573 ई. तक गुजरात पूर्णतः मुगल साम्राज्य में सम्मिलित हो गया। इस विजय से मुगल साम्राज्य की आर्थिक शक्ति बढ़ी और पश्चिमी भारत में उसका प्रभुत्व सुदृढ़ हुआ।

गुजरात विजय के पश्चात अकबर ने सिकरी के नाम मे 'फतेहपुर' (विजय का शहर) जोड़कर इसको फतेहपुर सिकरी नाम दिया और अब यह फतेहपुर सिकरी - विजय का शहर नाम से जाना जाने लगा। गुजरात विजय के पश्चात ही अकबर ने यहाँ बुलंद दरवाजा का निर्माण कराया जिसे गुजरात विजय का प्रतीक माना गया। बुलंद दरवाज़ा न केवल स्थापत्य की दृष्टि से अद्वितीय है, बल्कि अकबर की साम्राज्यवादी सफलता और गौरव का भी प्रतीक है।

1571 से अकबर ने फतेहपुर सिकरी को अपनी राजधानी बना लिया और साम्राज्य के प्रशासनिक, राजनीतिक तथा धार्मिक कार्य यहीं से संचालित किए जाते थे।

  • आगरा के बजाय अब सभी शाही फरमान यहीं से जारी होने लगे। 'दीवान-ए-आम' में अकबर आम जनता की फरियाद सुनता था और 'दीवान-ए-खास' में अपने मंत्रियों (जैसे बीरबल, अबुल फजल और राजा टोडरमल) के साथ गुप्त मंत्रणा करता था।
  • अकबर के 'नवरत्न' इसी शहर की शोभा बढ़ाते थे। तानसेन का संगीत 'अनूप तालाब' के बीच बने चबूतरे पर गूंजता था, तो अबुल फजल यहीं बैठकर 'अकबरनामा' जैसी ऐतिहासिक रचनाएँ लिख रहे थे।
  • फतेहपुर सीकरी अकबर के धार्मिक सुधारों की जन्मस्थली थी। यहीं पर 'इबादत खाना' में सभी धर्मों के गुरु चर्चा करते थे, जिससे अंततः 1582 में 'दीन-ए-इलाही' का विचार निकला।
फतेहपुर सीकरी की सुंदरता के कुछ प्रमुख पहलू ये थे:
1. लाल पत्थर और चमकता संगमरमर

पूरा शहर लाल बलुआ पत्थर (Red Sandstone) से चमक रहा था। पत्थरों पर इतनी बारीक नक्काशी की गई थी कि वे पत्थर नहीं, बल्कि लकड़ी या हाथीदांत पर किया गया काम लगते थे। शाम के समय जब सूरज की किरणें इन लाल इमारतों पर पड़ती थीं, तो पूरा शहर 'सुनहरा' दिखाई देता था।

2. पानी और हरियाली का संगम

शहर के एक तरफ 20 मील लंबी विशाल कृत्रिम झील थी, जो शहर को शीतलता प्रदान करती थी। महलों के बीच में अनूप तालाब जैसे जलाशय थे, जिनमें चांदी और सोने के सिक्के भरे रहते थे (जैसा कि कुछ वृत्तांतों में मिलता है)। पानी के बहाव के लिए ऐसी नहरें और नालियां बनाई गई थीं कि महलों के अंदर प्राकृतिक 'एयर कंडीशनिंग' जैसा अहसास होता था।

3. नवरत्नों की चहल-पहल

1571 के आसपास यह शहर बुद्धिजीवियों का केंद्र था।

  • तानसेन का संगीत शाम को फिजाओं में गूंजता था।
  • बीरबल के चुटकुले और उनकी हाजिरजवाबी महलों की शान थी।
  • इबादत खाना में दुनिया भर के धर्मगुरुओं और दार्शनिकों का जमावड़ा लगा रहता था।
4. वास्तुकला की विविधता

उस समय यहाँ की इमारतें बिल्कुल नई थीं।

  • पंच महल की पांचों मंजिलें खुली हुई थीं, जहाँ से पूरी घाटी का नजारा दिखता था।
  • जोधा बाई के महल की नीली टाइल्स (जो मुल्तान से मंगवाई गई थीं) धूप में चमकती थीं।
  • हर तरफ ऊंचे दरवाजे, विशाल मेहराब और सुंदर छतरियां थीं, जो हिंदू और मुस्लिम कला का मिलन दर्शाती थीं।
5. बाजारों की रौनक

शहर के नीचे की तरफ सराय और बाजार थे, जहाँ रेशम, कीमती रत्न और इत्र की दुकानें सजती थीं। चूंकि यह अकबर की नई राजधानी थी, इसलिए यहाँ दुनिया भर के व्यापारी, कलाकार और यात्री आते थे, जिससे शहर में हमेशा एक उत्सव जैसा माहौल रहता था।

एक रोचक तथ्य: पुर्तगाली यात्री फादर मॉन्सरेट ने लिखा था कि फतेहपुर सीकरी की सुंदरता और वहां का अनुशासन देखकर कोई भी दंग रह सकता था। यह शहर अकबर की कल्पना का एक साकार सपना था।

फतेहपुर सीकरी की प्रमुख इमारतें

अकबर ने यहाँ कई ऐसी संरचनाएं बनवाईं जो आज भी पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं:

1. बुलंद दरवाजा

बुलंद दरवाजा, जिसका अर्थ है "महान" या "ऊँचा" द्वार, फतेहपुर सीकरी की सबसे प्रभावशाली संरचना है। यह न केवल भारत का, बल्कि दुनिया के सबसे ऊँचे प्रवेश द्वारों में से एक है। अकबर ने इसका निर्माण  गुजरात विजय की याद में कराया था जिस कारण इसे "विजय स्मारक" भी कहा जाता है। इसके विशाल आकार के माध्यम से अकबर अपनी सत्ता और साम्राज्य की शक्ति का प्रदर्शन करना चाहता था। यह मुख्य रूप से फतेहपुर सीकरी की जामा मस्जिद का दक्षिणी प्रवेश द्वार है। इसी दरवाजे से प्रवेश करने के बाद आप मस्जिद के आंगन में पहुँचते हैं, जहाँ सफेद संगमरमर से बनी शेख सलीम चिश्ती की दरगाह स्थित है।

  • यह जमीन से लगभग 54 मीटर (177 फीट) ऊँचा है। मुख्य सीढ़ियों से इसकी ऊँचाई लगभग 42 मीटर है।
  • इसे बनाने में लाल बलुआ पत्थर (Red Sandstone) का उपयोग किया गया है, जबकि सजावट के लिए सफेद और काले संगमरमर का प्रयोग हुआ है।
  • दरवाजे तक पहुँचने के लिए 42 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, जो इसे और भी भव्य और ऊँचा दिखाती हैं।
  • यह दरवाजा आधा अष्टकोणीय (Semi-octagonal) आकार में बना है।
  • इसके स्तंभों और मेहराबों पर कुरान की आयतें उकेरी गई हैं। साथ ही, इसके शीर्ष पर छोटे-छोटे गुंबद (छतरियां) बनी हैं जो राजपूताना शैली से प्रेरित हैं।
  • बाहरी हिस्सा बहुत भव्य है, लेकिन अंदर की बनावट काफी सरल है, जो अकबर के संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाती है।
2. शेख सलीम चिश्ती की दरगाह

शेख सलीम चिश्ती की दरगाह फतेहपुर सीकरी के सबसे पवित्र और सुंदर हिस्सों में से एक है। यह जामा मस्जिद के विशाल आंगन के भीतर स्थित है और अपनी अलौकिक शांति व बेहतरीन नक्काशी के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है।

  • शुरुआत में जब अकबर ने इसे बनवाया था, तब यह लाल बलुआ पत्थर की थी। लेकिन बाद में (जहाँगीर के शासनकाल के दौरान) इसे पूरी तरह से कीमती सफेद संगमरमर से ढक दिया गया। यह मुगल वास्तुकला के उस दौर का प्रतीक है जब वे पत्थरों से संगमरमर की ओर बढ़ रहे थे।
  • इस दरगाह की सबसे बड़ी खासियत इसकी संगमरमर की जालियां हैं। ये खिड़कियाँ इतनी बारीकी से तराशी गई हैं कि दूर से देखने पर ये रेशमी कपड़े जैसी लगती हैं। इन जालियों में ज्यामितीय और फूलों के जटिल डिजाइन बने हुए हैं।
  • दरगाह के चारों ओर फैले हुए छज्जों को सहारा देने के लिए सांप के आकार के कोष्ठक बने हैं, जो हिंदू मंदिर वास्तुकला से प्रेरित हैं।
  • दरगाह का फर्श बहुरंगी संगमरमर से बना है और भीतरी छत को बहुत ही सुंदर तरीके से सजाया गया है।
  • बाबा की मजार (कब्र) के ऊपर आबनूस की लकड़ी का एक विशाल छत्र बना है, जिस पर सीप का काम किया गया है।
  • इसी दरगाह के पास 'जनाना रौजा' (शाही महिलाओं की कब्रें) और अकबर के परिवार के अन्य सदस्यों की कब्रें भी स्थित हैं। 

आज भी दूर-दूर से लोग यहाँ अपनी मुरादें लेकर आते हैं। एक पुरानी परंपरा है कि श्रद्धालु यहाँ की संगमरमर की जालियों पर लाल धागा बांधते हैं। माना जाता है कि जब मन्नत पूरी हो जाती है, तो वापस आकर वह धागा खोलना पड़ता है। अकबर ने भी यहीं पुत्र प्राप्ति की मन्नत मांगी थी, जो पूरी हुई।

3. महल परिसर

फतेहपुर सीकरी का 'महल परिसर' अकबर की जीवनशैली, उसकी पसंद और मुगल साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था का एक जीवंत दस्तावेज है। यह हिस्सा धार्मिक इमारतों (मस्जिद और दरगाह) से अलग है और यहाँ अकबर का निजी और शाही जीवन बसता था।

महल परिसर की सबसे प्रमुख इमारतें

1. जोधा बाई का महल

जोधा बाई का महल, फतेहपुर सीकरी के महल परिसर की सबसे विशाल और महत्वपूर्ण रिहायशी इमारत है। यह अकबर की सबसे चहेती राजपूत रानी, मरियम-उज़-ज़मानी (जोधा बाई) का निवास स्थान था।

  • इसमें राजस्थानी और गुजराती शैली का गहरा प्रभाव दिखता है। महल के अंदर छोटे मंदिर और तुलसी के पौधे के लिए जगह बनी हुई है।
  • इसकी छतों पर नीली टाइल्स का इस्तेमाल किया गया है, जो उस समय मुल्तान से मंगवाई गई थीं।
  • इतने बड़े महल में प्रवेश करने के लिए केवल एक ही मुख्य द्वार है, जिसे बहुत सुरक्षित बनाया गया था ताकि महल की महिलाओं की निजता बनी रहे।
  • महल के अंदर एक छोटा मंदिर भी बना हुआ था, जहाँ जोधा बाई अपनी धार्मिक रस्में पूरी करती थीं।
  • महल के भीतर ही मौसम के हिसाब से अलग-अलग कक्ष बने थे। उत्तर की ओर बना हिस्सा गर्मियों के लिए था (हवादार), जबकि दक्षिण की ओर का हिस्सा सर्दियों के लिए आरामदायक बनाया गया था।
2. पंच महल

यह पाँच मंजिला एक खुला हुआ महल है, जो ऊपर की ओर छोटा होता जाता है (पिरामिड की तरह)।

  • स्तंभों का महल: इसमें कुल 176 खंभे हैं। इसे 'हवा महल' भी कहा जाता था क्योंकि इसे ठंडी हवा का आनंद लेने और नीचे चल रहे उत्सवों को देखने के लिए बनाया गया था।
  • बौद्ध शैली: इसकी बनावट बौद्ध विहारों या मंदिरों से प्रेरित लगती है।
3. दीवान-ए-खास

यह अकबर का 'निजी परामर्श कक्ष' था, जो बाहर से साधारण लेकिन अंदर से अद्भुत है।

  • जादुई खंभा: इसके बीचों-बीच एक विशाल नक्काशीदार स्तंभ है, जिसके ऊपर एक पत्थर का चबूतरा बना है। अकबर इसी चबूतरे पर बैठता था, जबकि उसके मंत्री चारों कोनों से गलियारों के जरिए उससे जुड़े रहते थे।
4. बीरबल का महल

अकबर के सबसे प्रिय और चतुर मंत्री बीरबल के लिए बना यह महल वास्तुकला का रत्न है।

  • मजबूत बनावट: यह दो मंजिला है और इसकी नक्काशी इतनी बारीक है कि पत्थर लकड़ी की तरह कोमल लगते हैं। कहा जाता है कि यह अकबर की दो रानियों (रुकैया बेगम और सलीमा सुल्तान) के निवास के रूप में भी इस्तेमाल होता था।
5. अनूप तालाब 

महलों के बीच में बना यह एक सुंदर सजावटी जलाशय है।

  • तानसेन का मंच: इस तालाब के बीच में एक छोटा मंच बना है। लोक कथाओं के अनुसार, महान संगीत सम्राट तानसेन यहाँ बैठकर राग गाते थे, जिससे पूरा महल परिसर गूँज उठता था।
6. खवाबगाह

यह अकबर का निजी शयनकक्ष (Bedroom) था। इसकी दीवारों पर सुंदर चित्रकारी थी और यहाँ से सीधे 'दफ्तर खाना' और 'अनूप तालाब' का नजारा दिखता था।


राजधानी का परित्याग: क्यों वीरान हुआ यह शहर?

फतेहपुर सीकरी का पतन उतना ही अचानक था जितना इसका उत्थान। जिस शहर को अकबर ने अपने सपनों के महल की तरह बड़े चाव से सजाया था, उसे मात्र 14-15 वर्षों (1571-1585) के भीतर ही छोड़ना पड़ा। इस भव्य शहर के खंडहर में बदलने के मुख्य कारण नीचे दिए गए हैं:

1. पानी का भीषण संकट

यह फतेहपुर सीकरी के पतन का सबसे प्रमुख और तकनीकी कारण था।

  • भौगोलिक स्थिति: सीकरी एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित था। अकबर ने पानी की आपूर्ति के लिए एक विशाल कृत्रिम झील और 'ऱहठ' (Water Wheels) की एक जटिल प्रणाली बनाई थी।
  • विफलता: बढ़ती आबादी और सेना की जरूरतों के लिए झील का पानी कम पड़ने लगा। भूजल स्तर बहुत नीचे चला गया और शहर की जल निकासी व्यवस्था ठप हो गई। बिना पानी के इतने बड़े साम्राज्य का संचालन असंभव था।
2. उत्तर-पश्चिम सीमा पर युद्ध के बादल

अकबर का साम्राज्य केवल आगरा और दिल्ली तक सीमित नहीं था।

  • 1585 के आसपास, काबुल और कंधार (वर्तमान अफगानिस्तान) के क्षेत्रों में उज्बेकों और मिर्जा हकीम (अकबर का सौतेला भाई) के विद्रोह बढ़ गए थे।
  • सामरिक दृष्टि से फतेहपुर सीकरी इन सीमाओं से बहुत दूर था। सीमाओं की रक्षा के लिए अकबर को अपनी राजधानी को लाहौर स्थानांतरित करना पड़ा, ताकि वह युद्ध और राजनीति पर सीधी नजर रख सके।
3. सीकरी की खुली बनावट

आगरा का किला एक अभेद्य सुरक्षा घेरे (किलेबंदी) में था, जिसके किनारे यमुना नदी बहती थी। इसके विपरीत:

  • फतेहपुर सीकरी एक खुला शहर था। हालांकि इसके चारों ओर दीवारें थीं, लेकिन यह सुरक्षा के लिहाज से आगरा जितना मजबूत नहीं था।
  • साम्राज्य के विस्तार के साथ, अकबर को एक ऐसे केंद्र की जरूरत थी जो रक्षात्मक रूप से ज्यादा सुरक्षित हो।
4. अकबर की बदलती धार्मिक और राजनीतिक सोच

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि 1580 के दशक तक अकबर की विचारधारा में बदलाव आ रहा था।

  • वह अब केवल एक 'क्षेत्रीय' राजा नहीं बल्कि पूरे भारत का सम्राट था।
  • फतेहपुर सीकरी 'शेख सलीम चिश्ती' और उनके प्रति अकबर की व्यक्तिगत आस्था से गहराई से जुड़ा था। जैसे-जैसे अकबर ने 'दीन-ए-इलाही' और अधिक धर्मनिरपेक्ष राजनीति की ओर कदम बढ़ाए, इस शहर का आध्यात्मिक महत्व उसके लिए पहले जैसा नहीं रहा।

जब 1585 में अकबर लाहौर गया, तो धीरे-धीरे यहाँ की आबादी भी पलायन कर गई। दुकानें बंद हो गईं, बाग-बगीचे सूख गए और कभी दुनिया का सबसे खूबसूरत दिखने वाला यह शहर 'भूतिया शहर' बनकर रह गया। 

15 अक्टूबर 1986 को यूनेस्को ने फतेहपुर सीकरी को विश्व धरोहर स्थल में सम्मलित कर लिया और अब इसकी देखरेख भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और यूनेस्को मिलकर करते हैं। यूनेस्को ने इसे "विजय के शहर" के रूप में सूचीबद्ध किया है, जो अकबर की गुजरात और उत्तर भारत की सफलताओं को अमर बनाता है।