Vaidikalaya
प्रश्न: नेटवर्क आर्किटेक्चर (Network Architecture) क्या है इसके कितने प्रकार है और इसके कौन - कौन से कंपोनेंट्स है विस्तार से बताइये?

नेटवर्क आर्किटेक्चर किसी कंप्यूटर नेटवर्क का वह तार्किक (Logical) और भौतिक (Physical) ढांचा है जिसमें यह तय किया जाता है कि network में devices कैसे connect होंगे, data कैसे transfer होगा, कौन-सा device किस role में होगा, कौन-से protocols use होंगे और security कैसे manage होगी।

नेटवर्क आर्किटेक्चर एक ब्लूप्रिंट या योजना है जिसके आधार पर कंप्यूटर, सर्वर, राउटर, स्विच और अन्य डिवाइसों को आपस में जोड़कर संचार (communication) कराया जाता है।

उदाहरण:

किसी school, college, office या bank में कई computers होते हैं। ये सभी computers internet, printer, server और एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। इन सबको किस तरीके से connect किया गया है, यही network architecture कहलाता है।

Network Architecture के प्रकार

Network Architecture मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है:

  1. पीयर-टू-पीयर आर्किटेक्चर (Peer-to-Peer Network Architecture)
  2. क्लाइंट-सर्वर आर्किटेक्चर (Client-Server Network Architecture)

1. पीयर-टू-पीयर आर्किटेक्चर (Peer-to-Peer Network Architecture)

पीयर-टू-पीयर आर्किटेक्चर एक ऐसा  नेटवर्क आर्किटेक्चर है जिसमें नेटवर्क से जुड़े सभी कंप्यूटर या डिवाइस बराबर होते हैं। इसमें कोई dedicated server नहीं होता। हर computer दूसरे computer से directly data, files, printer या other resources share कर सकता है।

उदाहरण

मान लीजिए किसी छोटे office में 5 computers हैं। सभी computers आपस में connected हैं। Computer 1 में printer connected है और बाकी computers उसी printer को use कर सकते हैं। इसी तरह Computer 2 की files बाकी computers access कर सकते हैं। यह एक Peer-to-Peer Network का example है।

काम करने का तरीका / Working Mechanism

पीयर-टू-पीयर आर्किटेक्चर में सभी कंप्यूटर आपस में सीधे जुड़े होते हैं। इसमें कोई मुख्य सर्वर नहीं होता। हर कंप्यूटर को पीयर कहा जाता है। जब किसी पीयर को कोई फाइल या डेटा चाहिए होता है, तो वह नेटवर्क में जुड़े दूसरे पीयर से अनुरोध करता है। जिस पीयर के पास वह डेटा होता है, वह उसे सीधे भेज देता है।

इसमें हर पीयर दो काम करता है:

  1. Client की तरह — जब वह दूसरे पीयर से डेटा मांगता है।
  2. Server की तरह — जब वह दूसरे पीयर को डेटा भेजता है।

उदाहरण के लिए, यदि Peer A को कोई फाइल चाहिए और वह फाइल Peer B के पास है, तो Peer A सीधे Peer B से फाइल प्राप्त कर सकता है। बाद में Peer A वही फाइल किसी और Peer को भी दे सकता है।

Types of P2P Architecture
1. Pure P2P

इसमें कोई central server नहीं होता। सभी peers बराबर होते हैं। उदाहरण: Blockchain

2. Hybrid P2P

इसमें कुछ कामों के लिए central server use होता है, जैसे peer खोजने के लिए, लेकिन data sharing peers के बीच होती है। उदाहरण: कुछ file sharing systems जैसे BitTorrent, BitTorrent में जब आप कोई file download करते हैं, तो पूरी file एक server से नहीं आती। File के छोटे-छोटे parts अलग-अलग users से आते हैं।

P2P आर्किटेक्चर की मुख्य विशेषताएँ (Key Characteristics)
1. विकेंद्रीकृत प्रणाली (Decentralized System)

P2P नेटवर्क की सबसे बड़ी विशेषता इसका विकेंद्रीकृत होना है। इसमें कोई भी मुख्य कंप्यूटर या Central Authority नहीं होती। नेटवर्क का प्रत्येक हिस्सा स्वतंत्र रूप से काम करता है।

2. क्लाइंट और सर्वर की दोहरी भूमिका (Dual Role)

इस आर्किटेक्चर में, प्रत्येक नोड (Node) या कंप्यूटर एक ही समय में क्लाइंट (Client) और सर्वर (Server) दोनों की तरह कार्य करता है।

  • जब वह डेटा मांगता है, तो वह क्लाइंट होता है।
  • जब वह दूसरे कंप्यूटर को डेटा भेजता है, तो वह सर्वर बन जाता है।
3. समान दर्जा (Equal Status/Nodes)

नेटवर्क से जुड़े सभी कंप्यूटरों का पद और प्राथमिकता समान होती है। किसी भी कंप्यूटर के पास दूसरे कंप्यूटर को नियंत्रित करने का विशेष अधिकार नहीं होता। इसीलिए इन्हें 'Peers' (बराबर के साथी) कहा जाता है।

4. संसाधनों का साझाकरण (Resource Sharing)

प्रत्येक कंप्यूटर अपने हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर संसाधनों (जैसे: हार्ड डिस्क स्पेस, प्रिंटर, इंटरनेट कनेक्शन या फाइलें) को सीधे दूसरे कंप्यूटरों के साथ साझा कर सकता है। इसके लिए किसी बीच के सर्वर की जरूरत नहीं पड़ती।

5. उच्च विश्वसनीयता (No Single Point of Failure)

चूँकि इसमें कोई केंद्रीय सर्वर नहीं होता, इसलिए यदि नेटवर्क का कोई एक कंप्यूटर खराब हो जाए या बंद हो जाए, तो भी पूरा नेटवर्क ठप नहीं होता। बाकी के कंप्यूटर आपस में संचार करना जारी रखते हैं।

6. आसान स्थापना और विस्तार (Easy Setup and Scalability)
  • Setup: इसे कॉन्फ़िगर करना बहुत आसान है क्योंकि इसमें महंगे सर्वर ऑपरेटिंग सिस्टम की जरूरत नहीं होती।
  • Scalability: जैसे-जैसे नए कंप्यूटर (Peers) जुड़ते हैं, नेटवर्क की कुल स्टोरेज और प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ती जाती है।
7. कम लागत (Cost Effective)

इसमें महंगे 'डेडिकेटेड सर्वर' (Dedicated Server) और 'नेटवर्क एडमिनिस्ट्रेटर' की आवश्यकता नहीं होती, जिससे छोटे व्यवसायों या घरेलू उपयोग के लिए यह बहुत किफायती होता है।

P2P आर्किटेक्चर के लाभ (Advantages of P2P Architecture)
1. कम स्थापना लागत (Low Initial Cost)

P2P नेटवर्क को स्थापित करना बहुत सस्ता पड़ता है। इसमें किसी शक्तिशाली और महंगे सेंट्रल सर्वर (Central Server) की आवश्यकता नहीं होती। साथ ही, इसके लिए महंगे सर्वर ऑपरेटिंग सिस्टम के लाइसेंस भी नहीं खरीदने पड़ते।

2. सेटअप और प्रबंधन में आसानी (Easy to Setup & Manage)

इसे कॉन्फ़िगर करना बहुत सरल है। इसमें किसी विशेष 'नेटवर्क एडमिनिस्ट्रेटर' की जरूरत नहीं पड़ती। सामान्य जानकारी रखने वाला व्यक्ति भी कंप्यूटरों को आपस में जोड़कर डेटा साझा कर सकता है।

3. उच्च विश्वसनीयता (High Reliability)

इस नेटवर्क में Single Point of Failure नहीं होता।

  • क्लाइंट-सर्वर में यदि सर्वर खराब हो जाए, तो पूरा नेटवर्क बंद हो जाता है।
  • P2P में यदि एक या दो कंप्यूटर खराब भी हो जाएं, तो बाकी नेटवर्क सामान्य रूप से काम करता रहता है।
4. संसाधनों की उपलब्धता (Resource Availability)

जैसे-जैसे नेटवर्क में नए कंप्यूटर (Peers) जुड़ते हैं, नेटवर्क की कुल क्षमता (स्टोरेज और प्रोसेसिंग पावर) बढ़ती जाती है। हर नया कंप्यूटर नेटवर्क के लिए एक नया संसाधन केंद्र बन जाता है।

5. नेटवर्क ट्रैफिक का बँटवारा (Distributed Traffic)

चूँकि डेटा किसी एक कंप्यूटर पर नहीं होता, इसलिए सारा ट्रैफिक एक ही मशीन पर नहीं आता। इससे नेटवर्क पर Botttleneck (जाम) की स्थिति पैदा नहीं होती और डेटा अलग-अलग रास्तों से प्रवाहित हो सकता है।

6. छोटे व्यवसायों के लिए उपयुक्त (Ideal for Small Scales)

जहाँ 10 से कम कंप्यूटर हों और सुरक्षा बहुत बड़ी चिंता न हो (जैसे घर या छोटा ऑफिस), वहाँ P2P सबसे बेहतरीन और किफायती विकल्प है।

P2P आर्किटेक्चर की हानियाँ (Disadvantages of P2P Architecture)
1. सुरक्षा का अभाव (Lack of Security)

P2P नेटवर्क में सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती है। चूंकि इसमें कोई केंद्रीय नियंत्रण (Central Control) नहीं होता, इसलिए प्रत्येक कंप्यूटर को अपनी सुरक्षा स्वयं करनी पड़ती है। यदि एक भी कंप्यूटर असुरक्षित है, तो पूरे नेटवर्क में मैलवेयर या वायरस बहुत आसानी से फैल सकते हैं।

2. बैकअप की समस्या (No Central Backup)

क्लाइंट-सर्वर मॉडल में सारा डेटा एक ही सर्वर पर होता है, जिससे बैकअप लेना आसान है। लेकिन P2P में डेटा सभी कंप्यूटरों पर बिखरा होता है। नुकसान: हर यूजर को अपने डेटा का बैकअप अलग से लेना पड़ता है। यदि कोई एक यूजर बैकअप लेना भूल जाए और उसका कंप्यूटर खराब हो जाए, तो वह डेटा हमेशा के लिए खो सकता है।

3. प्रदर्शन में गिरावट (Performance Issues)

जब कोई कंप्यूटर नेटवर्क के अन्य 'Peers' को अपनी फाइलें साझा कर रहा होता है या संसाधन (Resources) प्रदान कर रहा होता है, तो उस कंप्यूटर की अपनी प्रोसेसिंग स्पीड धीमी हो जाती है। इससे उस कंप्यूटर पर काम करने वाले यूजर को परेशानी हो सकती है।

4. डेटा को खोजना कठिन (Difficulty in Locating Files)

चूंकि कोई केंद्रीय डेटाबेस नहीं होता, इसलिए यह पता लगाना मुश्किल हो सकता है कि कौन सी फाइल किस कंप्यूटर पर स्टोर है। जैसे-जैसे नेटवर्क में कंप्यूटरों की संख्या बढ़ती है, डेटा को मैनेज करना और खोजना बहुत जटिल हो जाता है।

5. विकेंद्रीकृत प्रशासन (Decentralized Administration)

इस नेटवर्क का कोई "एडमिनिस्ट्रेटर" नहीं होता। इसका मतलब है कि नेटवर्क के नियम (Policy) लागू करना कठिन है। उदाहरण के लिए, आप यह तय नहीं कर सकते कि कौन सा यूजर क्या देख सकता है, क्योंकि हर कोई अपने डिवाइस का मालिक खुद है।

6. स्केलेबिलिटी की सीमा (Scalability Issues)

P2P छोटे नेटवर्क (8-10 कंप्यूटर) के लिए तो अच्छा है, लेकिन जैसे ही नेटवर्क बड़ा होता है, इसकी दक्षता (Efficiency) गिरने लगती है। बहुत बड़े संस्थानों के लिए P2P नेटवर्क को संभालना लगभग असंभव हो जाता है।

"P2P की सबसे बड़ी कमी इसकी कमजोर सुरक्षा और डेटा प्रबंधन की कठिनाई है। यही कारण है कि बैंकिंग या बड़े कॉर्पोरेट नेटवर्क में इसका उपयोग नहीं किया जाता।"


2. क्लाइंट-सर्वर आर्किटेक्चर (Client-Server Network Architecture)

क्लाइंट-सर्वर आर्किटेक्चर एक केंद्रीकृत (Centralized) नेटवर्क मॉडल है जिसमें काम दो भागों में बाँटा जाता है: क्लाइंट और सर्वर। क्लाइंट वह कंप्यूटर या डिवाइस होता है जो किसी सेवा या डेटा की माँग करता है, जबकि सर्वर वह शक्तिशाली कंप्यूटर होता है जो क्लाइंट की माँग को पूरा करता है।

उदाहरण के लिए, जब हम ब्राउज़र में कोई वेबसाइट खोलते हैं, तो हमारा कंप्यूटर क्लाइंट की तरह काम करता है और वेबसाइट का डेटा देने वाला कंप्यूटर वेब सर्वर कहलाता है।

क्लाइंट-सर्वर आर्किटेक्चर एक ऐसी नेटवर्क संरचना है जिसमें कई क्लाइंट एक केंद्रीय सर्वर से जुड़कर सेवाएँ, डेटा, फाइलें, वेबसाइट, ईमेल या अन्य संसाधन प्राप्त करते हैं।

मुख्य घटक
  1. सर्वर (Server): यह एक उच्च क्षमता वाला शक्तिशाली कंप्यूटर है जो डेटा, फाइलों और सॉफ्टवेयर को स्टोर करता है। यह क्लाइंट्स द्वारा भेजे गए अनुरोधों (Requests) को स्वीकार करता है और उन्हें आवश्यक सेवा प्रदान करता है। जैसे वेब सर्वर, डेटाबेस सर्वर, फाइल सर्वर।
  2. क्लाइंट (Client): यह कम शक्तिशाली कंप्यूटर या डिवाइस (जैसे आपका PC, लैपटॉप, मोबाइल या कोई एप्लिकेशन) होता है जो सर्वर से जुड़ा होता है। यह अपनी जरूरतों के लिए सर्वर को रिक्वेस्ट भेजता है।
  3. नेटवर्क: क्लाइंट और सर्वर के बीच संचार नेटवर्क के माध्यम से होता है, जैसे LAN, WAN या Internet।
  4. प्रोटोकॉल: डेटा आदान-प्रदान के लिए कुछ नियमों का पालन किया जाता है, जिन्हें प्रोटोकॉल कहते हैं। जैसे HTTP, HTTPS, FTP, SMTP आदि।
क्लाइंट-सर्वर की कार्य प्रक्रिया (Working Process of Client-Server)

क्लाइंट-सर्वर आर्किटेक्चर मुख्य रूप से तीन चरणों में कार्य करता है:

चरण 1: अनुरोध भेजना (Sending Request)

सबसे पहले, क्लाइंट (जैसे आपका कंप्यूटर या मोबाइल) नेटवर्क के माध्यम से सर्वर को एक विशिष्ट सेवा या डेटा के लिए अनुरोध (Request) भेजता है।

  • उदाहरण: जब आप ब्राउज़र में www.google.com टाइप करते हैं, तो यह एक 'Request' है।
चरण 2: अनुरोध का प्रसंस्करण (Processing Request)

जब सर्वर को क्लाइंट का अनुरोध प्राप्त होता है, तो वह उसकी वैधता (Validity) की जाँच करता है। सर्वर अपने डेटाबेस में उस जानकारी को खोजता है जिसे क्लाइंट ने माँगा है। सर्वर यह भी चेक करता है कि क्लाइंट के पास उस डेटा को देखने की अनुमति (Permission) है या नहीं।

चरण 3: प्रतिक्रिया देना (Sending Response)

जानकारी मिल जाने के बाद, सर्वर उस डेटा को नेटवर्क के माध्यम से वापस क्लाइंट को भेज देता है। इसे प्रतिक्रिया (Response) कहा जाता है। यदि मांगी गई जानकारी नहीं मिलती, तो सर्वर 'Error Message' (जैसे 404 Not Found) भेजता है।

इस प्रक्रिया के मुख्य तकनीकी तत्व (Technical Elements):
  • प्रोटोकॉल (Protocols): क्लाइंट और सर्वर के बीच बातचीत कुछ नियमों के तहत होती है। जैसे वेबसाइट्स के लिए HTTP/HTTPS और फाइलों के लिए FTP।
  • IP एड्रेस: सर्वर को यह जानने के लिए कि डेटा किस क्लाइंट को वापस भेजना है, वह क्लाइंट के IP Address का उपयोग करता है।
  • नेटवर्क ट्रैफिक: एक ही समय में हजारों क्लाइंट एक सर्वर को रिक्वेस्ट भेज सकते हैं। सर्वर इन सभी को एक 'Queue' (कतार) में रखकर बारी-बारी से प्रोसेस करता है।
क्लाइंट-सर्वर आर्किटेक्चर के प्रकार
वन-टियर आर्किटेक्चर (1-Tier Architecture)

यह सबसे सरल प्रकार है जहाँ क्लाइंट, सर्वर और डेटाबेस (Database) सभी एक ही मशीन पर होते हैं।

  • यूजर सीधे उसी सिस्टम पर काम करता है जहाँ डेटा स्टोर है।
  • MS Access या स्थानीय सिस्टम पर चलने वाला कोई सॉफ्टवेयर।
  • यह वास्तविक "नेटवर्क" आर्किटेक्चर नहीं है क्योंकि इसमें डेटा कहीं बाहर से नहीं आता।
टू-टियर आर्किटेक्चर (2-Tier Architecture)

इसमें क्लाइंट और सर्वर के बीच सीधा संपर्क होता है। बीच में कोई और लेयर नहीं होती।

संरचना: 

  1. क्लाइंट लेयर (User Interface): जहाँ यूजर इनपुट देता है।
  2. सर्वर लेयर (Database Server): जहाँ डेटा स्टोर होता है और प्रोसेस किया जाता है।

विशेषता: यह तेज होता है लेकिन इसे बहुत बड़े नेटवर्क (जैसे इंटरनेट) के लिए इस्तेमाल करना कठिन है क्योंकि इसमें सुरक्षा कम होती है।

थ्री-टियर आर्किटेक्चर (3-Tier Architecture)

यह इंटरनेट पर उपयोग होने वाला सबसे लोकप्रिय मॉडल है। इसमें क्लाइंट और डेटाबेस के बीच एक तीसरी लेयर होती है जिसे Application Server या Middleware कहा जाता है। इसमें तीन स्तर होते हैं: client, application server और database server

संरचना: 

  1. Presentation Tier (Client): यूजर का कंप्यूटर या ब्राउज़र।
  2. Application Tier (Business Logic): यह सर्वर रिक्वेस्ट को प्रोसेस करता है और नियमों की जाँच करता है।
  3. Data Tier (Database): जहाँ सारा डेटा सुरक्षित रखा जाता है।

यह अत्यधिक सुरक्षित है और इसे बहुत बड़े स्तर पर (जैसे Facebook या Amazon) स्केल किया जा सकता है।

मल्टी-टियर (Multi-Tier Architecture)

इसमें कई layers होती हैं, जैसे presentation layer, business logic layer, database layer आदि। बड़े web applications में इसका उपयोग होता है।

क्लाइंट-सर्वर आर्किटेक्चर के लाभ (Advantages of Client-Server Architecture)
1. केंद्रीकृत डेटा प्रबंधन (Centralized Data Management)

इसमें सारा डेटा और फाइलें एक ही स्थान (सर्वर) पर स्टोर होती हैं। इससे डेटा को अपडेट करना, खोजना और मैनेज करना बहुत आसान हो जाता है। सभी क्लाइंट्स को एक साथ नई जानकारी मिल जाती है।

2. उच्च सुरक्षा (Enhanced Security)

क्लाइंट-सर्वर मॉडल में सुरक्षा बहुत मजबूत होती है। सर्वर पर एक्सेस कंट्रोल (Access Control) लगाया जा सकता है, जिससे केवल अधिकृत (Authorized) यूजर्स ही संवेदनशील डेटा देख सकते हैं। पूरे नेटवर्क की सुरक्षा एक ही जगह से नियंत्रित की जा सकती है।

3. आसान बैकअप और रिकवरी (Easy Backup and Recovery)

चूंकि सारा डेटा सर्वर पर होता है, इसलिए नेटवर्क एडमिनिस्ट्रेटर को हर कंप्यूटर का अलग-अलग बैकअप लेने की जरूरत नहीं पड़ती। सर्वर का एक बार बैकअप लेने से पूरे नेटवर्क का डेटा सुरक्षित हो जाता है। यदि कोई क्लाइंट कंप्यूटर खराब भी हो जाए, तो सर्वर से डेटा दोबारा प्राप्त किया जा सकता है।

4. स्केलेबिलिटी (Scalability)

यह आर्किटेक्चर बहुत लचीला होता है। नेटवर्क की कार्यक्षमता को प्रभावित किए बिना इसमें बहुत सारे नए क्लाइंट्स (कंप्यूटर या मोबाइल) को आसानी से जोड़ा जा सकता है। इसी कारण यह इंटरनेट जैसे बड़े नेटवर्क के लिए उपयुक्त है।

5. संसाधनों का साझाकरण (Resource Sharing)

महंगे हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर को एक ही सर्वर पर रखकर सभी क्लाइंट्स के बीच साझा किया जा सकता है। हर कंप्यूटर के लिए अलग प्रिंटर या भारी सॉफ्टवेयर खरीदने की आवश्यकता नहीं होती, जिससे लागत में कमी आती है।

6. बेहतर प्रदर्शन (Improved Performance)

सर्वर एक बहुत ही शक्तिशाली मशीन होती है जो जटिल गणनाओं और बड़े डेटाबेस को बहुत तेजी से प्रोसेस कर सकती है। इससे क्लाइंट कंप्यूटर पर बोझ कम पड़ता है और नेटवर्क की ओवरऑल स्पीड बनी रहती है।

क्लाइंट-सर्वर आर्किटेक्चर की हानियाँ (Disadvantages)
1. एकल बिंदु विफलता (Single Point of Failure)

यह इस आर्किटेक्चर की सबसे बड़ी कमी है। चूंकि पूरा नेटवर्क एक ही केंद्रीय सर्वर पर निर्भर होता है, इसलिए यदि मुख्य सर्वर खराब (Crash) हो जाता है, तो पूरे नेटवर्क का काम रुक जाता है। कोई भी क्लाइंट अपनी फाइलों या सेवाओं को एक्सेस नहीं कर पाता।

2. उच्च स्थापना और रखरखाव लागत (High Setup & Maintenance Cost)
  • हार्डवेयर: सर्वर के रूप में एक बहुत शक्तिशाली कंप्यूटर की आवश्यकता होती है, जो काफी महंगा आता है।
  • सॉफ्टवेयर: सर्वर के लिए विशेष Network Operating System (NOS) के लाइसेंस खरीदने होते हैं, जिनकी कीमत सामान्य विंडोज से बहुत अधिक होती है।
  • केबलिंग: इसे सेटअप करने के लिए महंगे नेटवर्किंग उपकरणों (जैसे हाई-स्पीड स्विच और राउटर्स) की जरूरत होती है।
3. नेटवर्क कंजेशन (Network Congestion)

जब एक ही समय में बहुत सारे क्लाइंट्स सर्वर को अनुरोध (Requests) भेजते हैं, तो सर्वर पर दबाव बढ़ जाता है। इससे डेटा ट्रांसफर की गति धीमी हो जाती है और सर्वर 'हैंग' या 'रिस्पॉन्स' देना बंद कर सकता है। इसे Traffic Bottleneck भी कहा जाता है।

4. कुशल विशेषज्ञ की आवश्यकता (Need for Specialists)

क्लाइंट-सर्वर नेटवर्क को कॉन्फ़िगर करना, मैनेज करना और सुरक्षा सुनिश्चित करना एक सामान्य यूजर के बस की बात नहीं है। इसके लिए एक कुशल नेटवर्क एडमिनिस्ट्रेटर (Network Administrator) को नियुक्त करना पड़ता है, जिससे संस्था का खर्च और बढ़ जाता है।

5. सुरक्षा जोखिम (Security Vulnerability)

यद्यपि यह केंद्रीकृत होने के कारण सुरक्षित है, लेकिन इसका एक नकारात्मक पहलू भी है। यदि कोई हैकर किसी तरह मुख्य सर्वर में सेंध लगा लेता है, तो पूरे नेटवर्क का सारा डेटा एक साथ चोरी या नष्ट हो सकता है।

क्लाइंट-सर्वर आर्किटेक्चर आधुनिक नेटवर्किंग का एक महत्वपूर्ण मॉडल है। इसमें client request भेजता है और server response देता है। यह मॉडल centralized data management, security और efficient resource sharing प्रदान करता है। इसलिए इसका उपयोग इंटरनेट, ऑफिस नेटवर्क, बैंकिंग, शिक्षा और कई ऑनलाइन सेवाओं में व्यापक रूप से किया जाता है।